क्या आप जानते हैं कि कैसे हुई थी चरणामृत की उत्पवत्ति?

क्या आप जानते हैं कि कैसे हुई थी चरणामृत की उत्पवत्ति?

एनटीटीवी- चरणामृत के बारे में तो हम सभी जानते हैं कि यह किसी भी पूजा का महत्‍वपूर्ण प्रसाद होता है। इसके बिना भगवान का भोग पूर्ण नहीं माना जाता है। यही नहीं कई सारे ऐसे मंदिर हैं जहां का चरणामृत पीने से लोगों की गंभीर से गंभीर बीमारियां दूर हो गईं। हमारे धर्म शास्‍त्रों में भी इसकी महिमा का बखान मिलता है। लेकिन क्‍या आपने सोचा है कि ऐसा क्‍या होता है चरणामृत में जिससे बड़ी से बड़ी परेशानियों से निजात मिल जाती है। या फिर ये सवाल मन में आता हो कि चरणामृत की शुरुआत कैसे हुई होगी?

चरणामृत यानी कि प्रभु के चरणों को अमृत। इसे पीने से समस्‍त पापों का नाश होता है। शास्‍त्रों में इसका बखान इस तरह मिलता है कि 'अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।'  यानी कि यह एक ऐसा अमृत है, जिसे पीने से मनुष्‍य को अकाल मृत्‍यु का भय नहीं रहता। यह सभी पापों का नाश कर देता है। साथ ही भगवान विष्‍णु के चरणों को धोने वाले जल को पीने से व्‍यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

यह है चरणामृत उत्‍पत्ति की कथा

चरणामृत के बारे में कथा मिलती है कि जब भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से दान में तीन पग भूमि में तीनों लोक मांग लिए। तब ब्रह्मा जी ने प्रभु के चरण धोकर जल को वापस अपने कमंडल में रख लिया। इसे चरणामृत की संज्ञा दी गई। यही जल फिर गंगा बनकर पृथ्‍वी पर मनुष्‍य कल्‍याण के लिए अवतरित हुआ। रामायण के केवट प्रसंग में भी चरणामृत का महत्‍व बताया गया है। जब केवट प्रभु श्रीराम के चरणों को धोकर उसी जल से अपने परिवार, अपने गांव और अपने पितरों को भव पार करवा देता है। यही वजह है कि युगों बाद भी यह परंपरा आज भी कायम है और लोगों को सदैव ही चरणामृत का अमृतमयी लाभ मिलता आ रहा है।

 

औषधीय गुणों वाला है चरणामृत

चरणामृत का न केवल धार्मिक महत्‍व है बल्कि चिकित्‍सा में भी इसका महत्‍व माना गया है। कहा जाता है कि तांबे के पात्र में रखने से गंगाजल इतना शुद्ध हो जाता है कि वह शरीर की समस्‍त व्‍याधियों को दूर कर देता है। साथ ही चरणामृत में तुलसी के पत्‍ते से इसकी औषधीय गुणवत्‍ता बढ़ जाती है। यही वजह है कि चरणामृत पीने से व्‍यक्ति की स्‍मरण क्षमता और बुद्धि का विकास होता है।